सोमवार, 4 अगस्त 2014

हीरा

हीरा :-



 

हीरा एक पारदर्शी रत्न है। हीरा सभी रत्नों में सर्वोपरि, चमकदार व कठोर होता है। इसमें खरोंच नहीं आती इसीलिए इसे वज्र कहा गया है। यह पृथ्वी के गर्भ में लाखों वर्षों की प्रक्रिया के उपरांत कोयले से बना बेशकीमती रत्न है। इसमें दाग, धब्बा, खरोंच होना दोषयुक्त माना गया है। असली हीरे को धूप में रखने पर किरणें निकलने लगती हैं। इसकी चमकदार किरणों की संख्या से पहचान की जाती है। यह पृथ्वी के गर्भ में लाखों वर्षों की प्रक्रिया के उपरांत कोयले से बना बेशकीमती रत्न है। यह रासायनिक रूप से कार्बन का शुद्धतम रूप है। हीरा में प्रत्येक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं के साथ सह-संयोजी बन्ध द्वारा जुड़ा रहता है। हीरा ऊष्मा तथा विद्युत का कुचालन होता है। हीरा प्राकृतिक पदार्थो में सबसे कठोर पदा‍र्थ है, इसकी कठोरता के कारण इसका प्रयोग कई उद्योगो तथा आभूषणों में किया जाता है। अब नई तकनीक व मशीनों के कारण हीरों का उत्पादन अधिक सरल हो गया है। हीरे केवल सफ़ेद ही नहीं होते अशुद्धियों के कारण इसका शेड नीला, लाल, संतरा, पीला, हरा व काला होता है। सोलहवीं शताब्दी के लगभग भारत भी हीरा उत्पादक क्षेत्रों में माना जाता रहा। हरा हीरा सबसे दुर्लभ है। हीरे को यदि ओवन में 763 डिग्री सेल्सियस पर गरम किया जाये, तो यह जलकर कार्बन डाइ-आक्साइड बना लेता है तथा बिल्कुल ही राख नहीं बचती है। इससे यह प्रमाणित होता है कि हीरा कार्बन का शुद्ध रूप है। हीरा रासायनिक तौर पर बहुत निष्क्रिय होता है एवं सभी घोलकों में अघुलनशील होता है। इसका आपेक्षिक घनत्व 3.51 होता है। बहुत अधिक चमक होने के कारण हीरा को जवाहरात के रूप में उपयोग किया जाता है। हीरा उष्मीय किरणों के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील होता है, इसलिए अतिशुद्ध थर्मामीटर बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। काले हीरे का उपयोग काँच काटने, दूसरे हीरे के काटने, हीरे पर पालिश करने तथा चट्टानों में छेद करने के लिए किया जाता है। तथा श्वेत हीरा सात्विक, लाल हीरा तमोगुणी, पीला हीरा रजोगुणी तथा काला हीरा शूद्रवर्णीय होता है।

                       पंडित एन. एम. श्रीमाली जी के अनुसार हीरा शुक्र का रत्न है। वृषभ व तुला राशि के अधिपति शुक्र हैं। इनका हीरा स्वयं तो मूल्यवान है ही, धारक को भी मालामाल कर देता है। यदि कुंडली के अच्छे भावों के स्वामी शुक्र हों, तो हीरा धारण कर सुख-संपदा में वृद्धि की जा सकती है। लग्नेश शुक्र होने पर शरीर व स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, पंचमेश शुक्र होने पर संतान व शिक्षा के लिए तथा नवमेश शुक्र होने पर भाग्योन्नाति, संतान सुख व धर्म कार्य की वृद्धि के लिए हीरा धारण करना चाहिए। कई देवज्ञ शुक्र की महादशा में बाधाएँ आने पर, विवाह संबंधों में विलंब होने पर तथा कुंडली में शुक्र निर्बल, पीड़ित व शत्रु क्षेत्रीय होने पर भी पंडित एन. एम. श्रीमाली जी हीरा धारण करने का परामर्श देते हैं।

                       शुक्र महाराज काम के देवता हैं। इनकी प्रसन्नता मानव जीवन को सृजन, कला व आनंद से जोड़ती है। अतः यथायोग्य स्थिति को ज्ञात कर हीरा धारण करने पर शुभता में वृद्धि होती है। हीरे के साथ मोती, माणिक्य, मूँगा तथा पीला पुखराज धारण करना निषेध है। ग्रहजन्य पीड़ा से भी मुक्ति दिलाने में हीरा सिद्ध प्रयोग है। यद्यपि ग्रहजन्य पीड़ा भी हीरा रासायनिक परिवर्तनों के द्वारा ही दूर करता है, किन्तु यह पीड़ा दैविक होती है। हीरा किसी भी औजार से न काटा जा सके, हाथ में उठाने पर भारी व देखने में हलका (फैलाव वाला) महसूस हो, जल में उत्तम, उठी हुई किरणों से तैरता-सा प्रतीत हो, चमक हो, बिजली, अग्नि या इन्द्रधनुषी रंगत वाली झलक दिखती हो तो वह हीरा उत्तम होता है।


हीरा रत्न धारण करने की विधि :-
 

जो व्यक्ति शुक्र देव का रत्न हीरा धारण करना चाहते है, तो 0.50 से 2 कैरेट तक के हीरे को चाँदी या सोने की अंगूठी में जड्वाकर किसी भी शुक्लपक्ष के शुक्रवार को सूर्य उदय के पश्चात अंगूठी को दूध, गंगा जल, शक्कर और शहद के घोल में डाल दे! उसके बाद पांच अगरबत्ती शुक्रदेव के नाम जलाये और प्रार्थना करनी चाहिए - हे शुक्र देव मै आपका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आपका प्रतिनिधि रत्न हीरा धारण कर रहा हूँ, कृपया करके मुझे आशीर्वाद प्रदान करे! तत्पश्चात अंगूठी को निकाल कर शुक्र के सोलह हजार जप (ॐ शं शुक्राय नम:) का 108 बार जप करते हुए अंगूठी को अगरबत्ती के उपर से घुमाए फिर मंत्र के पश्चात् अंगूठी को लक्ष्मी जी  के चरणों से लगाकर कनिष्टिका या मध्यमा ऊँगली में धारण करे!  हीरा अपना प्रभाव 25 दिन में देना आरम्भ कर देता है, और लगभग 7 वर्ष तक पूर्ण प्रभाव देता है फिर निष्क्रिय हो जाता है! 7 वर्ष के पश्चात् पुनः नया हीरा धारण करना चाहिए! अच्छे प्रभाव प्राप्त करने के लिए हीरे का रंग सफ़ेद और कोई काला दाग नहीं होना चाहिए!





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